Tuesday, September 13, 2011

भगवान वराह का सबसे प्रिय स्थान है सूकर क्षेत्र

कासगंज। सोरों जी पूर्वजों के मोक्ष का श्रेष्ठ धाम है। शूकर क्षेत्र का सोरों पृथ्वी का उद्धार करने वाले भगवान विष्णु के तृतीय अवतार भगवान श्री वराह की निर्वाण स्थली है। स्वयं भगवान वराह ने यहां के महात्म्य के बारे में कहा है कि हे दवि। हे पृथ्वी।। जो व्यक्ति मेरे परम मित्र सूकर क्षेत्र में जाते हैं, उनके पूर्ववर्ती 10 पूर्वज तथा 15 परवर्ती वंशजों की सद्गति सुनिश्चित हो जाती है। इसके अतिरिक्त तीर्थयात्रा करने वाले व्यक्ति को अगले सात जन्म तक उच्चकुल में जन्म लेता है।
सोरों जी के हर की पौड़ी में मनुष्य जितनी अस्थियां विसर्जित करते हैं, उतने सहस्त्र वर्ष पर्यंत उनके पूर्वज मेरे लोक में सुख भोगकर पृथ्वी पर राज करते हैं। वराह पुराण के मुताबिक यह पूर्वजों के मोक्ष का श्रेष्ठ धाम है। यहां किया गया श्राद्ध कर्म सीधे पितरों को प्राप्त होता है। यहां इस क्षेत्र में किया गया पिंडदान कर्म तर्पण और दान कर्म पितरों की संतुष्टि का साधन बनता है। यह पावन क्षेत्र है, यह उपवास करने, रात्रि जागरण करने और पितरों के श्राद्ध से यहां महापुण्य प्राप्त होता है।
डॉ. राधाकृष्ण दीक्षित का कहना है कि यह क्षेत्र पृथ्वी का आदि क्षेत्र है। यह वराह गंगा, वृहद गंगा और भागीरथ गंगा के पवित्र अंचल में स्थित है। इस तीर्थस्थल को देखने, यहां की रज को स्पर्श करने और दान आदि से पितर ही नहीं, व्यक्ति स्वयं भी मोक्ष का अधिकारी हो जाता है। भगवान वराह का यह अति प्रिय क्षेत्र है। इसी के चलते यहां उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। श्राद्ध कर्म के लिए शूकर क्षेत्र सर्वोत्तम है। यहां मृतक परिजनों की अस्थियों का विसर्जन वर्षों से किया जाता है।

Monday, September 12, 2011