| Story Update : Saturday, August 14, 2010 12:02 AM | |
कासगंज। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यहां के क्रांतिकारियों के जोश और जज्बे को देखकर स्वतंत्रता संग्राम के नायक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं पंडित जवाहर लाल नेहरू कासगंज आए थे। उन्होंने क्रांतिकारियों के बीच जोश का संचार किया। नेताओं के आगमन के दौरान क्षेत्र की महिलाओं ने अपने आभूषण तक उतारकर इन महापुरुषों का अभिनंदन किया। असहयोग आंदोलन के समय में आजादी की ज्वाला तेजी से धधक रही थी। इसी दौरान १९२१ सितंबर माह में पंडित जवाहरलाल नेहरू का कासगंज आगमन हुआ था। पंडित नेहरू ने यहां के अचल ताल में एक सभा भी की थी। इस सभा में क्रांति के जोश का संचार हुआ था। इसके बाद वर्ष १९२९ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का आगमन हुआ। राष्ट्रपिता के आगमन की सूचना क्षेत्र के लोगों को हुई तो बड़ी संख्या में लोग उनके दर्शनों को उमड़ पड़े। उन्होंने यहां की गंगा चुंगी धर्मशाला और अचल ताल पर जनसभाओं को संबोधित किया और आगामी स्वतंत्रता संग्राम के लिए तैयार रहने का संकेत दिया था। यहां के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास बताता है कि इन सभाओं में स्त्रियों ने अपने आभूषण तक उतारकर इन महापुरुषों का अभिनंदन किया। ग्राम पिवारी के ठाकुर माधौ सिंह ने इनका अभिनंदन किया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कासगंज की बसावट ठीक चौसर की तरह थी, जो आज भी है। यहां जो पहले अचल ताल था, अब उसका नाम प्रभूपार्क है। १९४७ में आजादी के समय शहर का स्वरूप सीमित था, लेकिन अब कई किलोमीटर में इसका दायरा फैल चुका है। | |
Wednesday, August 18, 2010
अचलताल से जुड़ी हैं गांधी, नेहरू की यादें
आजादी के लिए महिलाओं ने दिखाए जौहर
कासगंज। स्वतंत्रता आंदोलन में जनपद की महिलाओं ने महत्वपूर्ण योगदान देकर अपने सच्चे राष्ट्रप्रेम का परिचय दिया। महिलाओं ने विदेशी कपड़ों एवं शराब की दुकानों पर धरने दिए। प्रभात फेरियां निकाली, अमन सभाएं भंग की। सन १९३०, ३२, ४१ और १९४२ के आंदोलनों में इन महिलाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। स्वतंत्रता संग्राम में जनपद की महिलाओं ने अद्भुत शौर्य, साहस एवं उत्साह का परिचय दिया जो जनपद के लिए गौरव का विषय है।
इन महिलाओं में मोहनपुर गांव की गंगादेवी पाराशर धर्मपत्नी गोपाल दत्त पाराशर सबसे प्रमुख थी, जिन्हें आंदोलनों में सक्रिय होने के कारण छह बार गिरफ्तार किया गया और छोड़ दिया गया। १९३२ के स्वतंत्रता संग्राम में इन्हें छह माह की जेल तथा १५ रुपये जुर्माने भरने की सजा मिली। १९४१ में छह माह की जेल और २० रुपये का जुर्माना भरना पड़ा। देश की आजादी के लिए इन्होंने तीन बार जेल की सजा काटी। इन्होंने जिला कांग्रेस कमेटी तथा भारत सेवक समाज की महिला संयोजिका के रुप में उल्लेखनीय कार्य किया। इसी गांव की गंगादेवी पत्नी पुरुषोत्तम ने १९३२ के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण छह माह की जेल तथा १० रुपये का दंड भोगा। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मानपाल गुप्त की पत्नी मायादेवी कासगंज ने १९३२ में १० रुपये जुर्माने का दंड भोगा। इसी वर्ष वे एक बार फिर से गिरफ्तार की गई। इस बार तीन माह की जेल तथा २५ रुपए का दंड भरना पड़ा। १९३२ में इन्हें दो बार जेल जाना पड़ा। कासगंज की शिवरानी पत्नी निरंकार प्रसाद को नमक सत्याग्रह में भाग लेने के कारण तीन माह की जेल और २५ रुपये जुर्माना भी हुआ। सोरों निवासी नरेन्द्र देवी पत्नी परमानंद को १९३० में तीन माह की सजा हुई। वहीं प्रेमवती गुप्ता पुत्री मथुरा प्रसाद गुप्ता निवासी सोरों गेट कासगंज को प्रथम बार १९३० में छह मास की जेल और ५० रुपये का जुर्माना भरना पड़ा। दूसरी बार डेढ़ वर्ष की सजा हुई, लेकिन गांधी-इरविन समझौते के कारण वे जेल जीवन से मुक्ति मिल गई। इन महिलाओं के अतिरिक्त अनेक ऐसी महिलाएं भी हैं, जिन्हे गिरफ्तार किया गया, किंतु बिना दंड के ही छोड़ दिया गया। उन महिलाओं का त्याग भी अविस्मरणीय रहेगा जिनके पति, पुत्र या भाई स्वतंत्रता आंदोलन में जेल गए।
इन महिलाओं में मोहनपुर गांव की गंगादेवी पाराशर धर्मपत्नी गोपाल दत्त पाराशर सबसे प्रमुख थी, जिन्हें आंदोलनों में सक्रिय होने के कारण छह बार गिरफ्तार किया गया और छोड़ दिया गया। १९३२ के स्वतंत्रता संग्राम में इन्हें छह माह की जेल तथा १५ रुपये जुर्माने भरने की सजा मिली। १९४१ में छह माह की जेल और २० रुपये का जुर्माना भरना पड़ा। देश की आजादी के लिए इन्होंने तीन बार जेल की सजा काटी। इन्होंने जिला कांग्रेस कमेटी तथा भारत सेवक समाज की महिला संयोजिका के रुप में उल्लेखनीय कार्य किया। इसी गांव की गंगादेवी पत्नी पुरुषोत्तम ने १९३२ के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण छह माह की जेल तथा १० रुपये का दंड भोगा। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मानपाल गुप्त की पत्नी मायादेवी कासगंज ने १९३२ में १० रुपये जुर्माने का दंड भोगा। इसी वर्ष वे एक बार फिर से गिरफ्तार की गई। इस बार तीन माह की जेल तथा २५ रुपए का दंड भरना पड़ा। १९३२ में इन्हें दो बार जेल जाना पड़ा। कासगंज की शिवरानी पत्नी निरंकार प्रसाद को नमक सत्याग्रह में भाग लेने के कारण तीन माह की जेल और २५ रुपये जुर्माना भी हुआ। सोरों निवासी नरेन्द्र देवी पत्नी परमानंद को १९३० में तीन माह की सजा हुई। वहीं प्रेमवती गुप्ता पुत्री मथुरा प्रसाद गुप्ता निवासी सोरों गेट कासगंज को प्रथम बार १९३० में छह मास की जेल और ५० रुपये का जुर्माना भरना पड़ा। दूसरी बार डेढ़ वर्ष की सजा हुई, लेकिन गांधी-इरविन समझौते के कारण वे जेल जीवन से मुक्ति मिल गई। इन महिलाओं के अतिरिक्त अनेक ऐसी महिलाएं भी हैं, जिन्हे गिरफ्तार किया गया, किंतु बिना दंड के ही छोड़ दिया गया। उन महिलाओं का त्याग भी अविस्मरणीय रहेगा जिनके पति, पुत्र या भाई स्वतंत्रता आंदोलन में जेल गए।
पटियाली में भी कम नहीं थे आजादी के दीवाने
पटियाली। १९४२ में गांधी जी के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में कसबा और देहात के लोगों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। स्वतंत्रता की लड़ाई का बिगुल कटरी क्षेत्र के ग्राम बड़ौला से बजा जिसकी गूंज पर कसबा के लोगों ने भी हिस्सा लिया। १९४१ में ग्राम बड़ौला निवासी ठाकुर चितर सिंह के तीन पुत्र भूप सिंह, पंजाब सिंह और आलम सिंह ने अगवाई कर ग्रामीणों के सहयोग से अंग्रेजों की फौज से जमकर मुकाबला लिया और हिंसक झड़पों के बाद रामू नाम के उस निर्दोष व्यक्ति को गोरे अंग्रेजों के चंगुल से छुड़ा लिया, जिसे अंग्रेज बीच गांव नंगा कर पीटने के बाद गिरफ्तार कर अपने साथ ले जा रहे थे।
तीतर नामक अंग्रेज सिपाही का इस मारपीट में हाथ टूटने के अलावा सिर भी फूट गया था। तीनों भाई घर से इस घटना के बाद भागकर गांधी जी द्वारा चलाए जा रहे सत्याग्रह आंदोलन में शामिल हो गए। जहां इन्होंने नरथर रेलवे स्टेशन पर रेलवे लाइन को उखाड़ फेंका था। आजादी के तीनों दीवानों को अग्रेंजों ने गिरफ्तार कर एटा जेल में डाल दिया था। तीनों भाइयों के जेल जाने के गम में उनके माता-पिता ने प्राण त्याग दिए थे। १८ दिसंबर १९४२ को गिरफ्तार किए गए तीनों भाई दो वर्ष बाद १८ दिसंबर १९४४ को रिहा किए गए। इसी तरह १९४२ के आंदोलन में कसबा के मोहल्ला बिरतियाना निवासी कुंदनलाल पांडेय के दो पुत्र राजाराम पांडेय और ग्याप्रसाद पांडेय ने भी बढ़ चढ़कर स्वतंत्रता के आंदोलन में हिस्सा लिया। अंग्रेज सिपाही रोस्ठेलर को थप्पड़ मारने और आजादी के आंदोलन के तहत पटियाली का बाजार बंद कराने के आरोप में दोनों भाइयों को धारा ३३२, १४७ के आरोप में गिरफ्तार किया गया। जहां से तीन वर्ष बाद १९४५ को दोनों भाई रिहा हो सके। इस दौरान दोनों भाइयों को गंभीर यातनाएं दी गईं। इन्हें काल कोठरी तक में रखा गया।
तीतर नामक अंग्रेज सिपाही का इस मारपीट में हाथ टूटने के अलावा सिर भी फूट गया था। तीनों भाई घर से इस घटना के बाद भागकर गांधी जी द्वारा चलाए जा रहे सत्याग्रह आंदोलन में शामिल हो गए। जहां इन्होंने नरथर रेलवे स्टेशन पर रेलवे लाइन को उखाड़ फेंका था। आजादी के तीनों दीवानों को अग्रेंजों ने गिरफ्तार कर एटा जेल में डाल दिया था। तीनों भाइयों के जेल जाने के गम में उनके माता-पिता ने प्राण त्याग दिए थे। १८ दिसंबर १९४२ को गिरफ्तार किए गए तीनों भाई दो वर्ष बाद १८ दिसंबर १९४४ को रिहा किए गए। इसी तरह १९४२ के आंदोलन में कसबा के मोहल्ला बिरतियाना निवासी कुंदनलाल पांडेय के दो पुत्र राजाराम पांडेय और ग्याप्रसाद पांडेय ने भी बढ़ चढ़कर स्वतंत्रता के आंदोलन में हिस्सा लिया। अंग्रेज सिपाही रोस्ठेलर को थप्पड़ मारने और आजादी के आंदोलन के तहत पटियाली का बाजार बंद कराने के आरोप में दोनों भाइयों को धारा ३३२, १४७ के आरोप में गिरफ्तार किया गया। जहां से तीन वर्ष बाद १९४५ को दोनों भाई रिहा हो सके। इस दौरान दोनों भाइयों को गंभीर यातनाएं दी गईं। इन्हें काल कोठरी तक में रखा गया।
पटियाली में क्रांतिकारियों ने लूटा था सरकारी खजाना
कासगंज। १८५७ की क्रांति से ही यहां के क्रांतिवीरों का जज्बा देखने लायक था। तमाम क्रांतिकारियों ने इस क्रांति में अपनी शहादत दी। कासगंज, सोरों, भिटौना, कादरवाड़ी और कालाजार पर गोरों से जबरदस्त युद्ध हुआ। कई क्रांतिकारियों को सरेआम पेड़ों पर बांध कर गोलियां मारकर कत्ल कर दिया गया।
१८५७ की क्रांति के दौरान यह ज्वाला २५ मई को कासगंज के बाराद्वारी पर फूटी। जहां जबरदस्त संघर्ष हुआ। तीर्थ नगरी सोरों में भी जबरदस्त संघर्ष हुआ। सोरों में गंगा के घाटों और नावों पर क्रांतिकारियों ने कब्जा जमा लिया। सोरों की क्रांतिकारी सदासुखराय सक्सेना, विशंभर कोठेवार, सदाशिव महेरे, रामनाथ तिवारी, चतुर्भुज वैश्य, द्वारिका प्रसाद, हकीम रजावली, चेतराम, बबलू, आदि ने क्रांति की बागडोर अपने हाथों में थाम ली थी जो ब्रिटिश हुकूमत के लिए बड़ी चुनौती बनी। सदाशिव महेरे वेदपाठी ब्राह्मण और कुशल सेनानी थी। इन सेनानियों ने अपने बुद्धिबल से आसपास की ब्रिटिश सत्ता के चिह्न मिटाकर संग्राम छेड़ रखा था। २६ मई को क्रांतिकारी शिवदान, रामनाथ तिवारी और चतुर्भुज वैश्य को कासगंज में पीपल और नीम के पेड़ पर लटकाकर संगीनों से मौत के घाट उतार दिया। इसके अलावा कादरगढ़, पटियाली, कालाजार और अन्य स्थानों पर क्रांति ने वीरों की जानें लीं। क्रांतिकारियाें ने तमाम ब्रिटिश फौजियों को भी मौत के घाट उतार दिया। कालाजार में तो नौ ब्रिटिश को मौत के घाट उतारा गया। अंग्रेजों के अत्याचार जैसे जैसे बढ़ते गए वैसे वैसे क्रांति तेज होती गई। गंगा नदी और काली नदी के घाटों पर क्रांतिकारियों ने कब्जा जमाया था। कासगंज में चतुर्भुज चौबे नाम के क्रांतिकारी के सर को अंग्रेजों ने काटकर पीपल के पेड़ पर लटका दिया था। १८५७ की क्रांति में अनेकों क्रांति के सपूतों ने जबरदस्त लोहा लिया और अपनी जान गवाईं, लेकिन क्रांति का ज्वर कभी ठंडा नहीं हुआ। अंग्रेज कलक्टरों को अपनी जान बचाने के लिए दूसरे क्षेत्रों में भागना पड़ा था। गंगाघाटों पर घुड़सवार ब्रिटिश फौजियों को भी मौत के घाट उतारा गया। सोरों के कादरवाड़ी इलाके में क्रांतिकारियों के दमन के लिए तोपों द्वारा कादरगढ़ के गढ़ को ध्वस्त किया गया। यहां क्रांतिकारी टोडर सिंह, हरिहर सिंह, जोधा सिंह, विजय सिंह ने जमकर मोर्चा लिया। पटियाली में भी अंग्रेज शासकों और क्रांतिकारियों के बीच खूनी संघर्ष हुआ। क्रांतिकारी दयाराम, बहादुरलाल, खान सहाय ने सरकारी अंग्रेजी खजाने को लूटा। यहां जबरदस्त जंग हुई।
१८५७ की क्रांति के दौरान यह ज्वाला २५ मई को कासगंज के बाराद्वारी पर फूटी। जहां जबरदस्त संघर्ष हुआ। तीर्थ नगरी सोरों में भी जबरदस्त संघर्ष हुआ। सोरों में गंगा के घाटों और नावों पर क्रांतिकारियों ने कब्जा जमा लिया। सोरों की क्रांतिकारी सदासुखराय सक्सेना, विशंभर कोठेवार, सदाशिव महेरे, रामनाथ तिवारी, चतुर्भुज वैश्य, द्वारिका प्रसाद, हकीम रजावली, चेतराम, बबलू, आदि ने क्रांति की बागडोर अपने हाथों में थाम ली थी जो ब्रिटिश हुकूमत के लिए बड़ी चुनौती बनी। सदाशिव महेरे वेदपाठी ब्राह्मण और कुशल सेनानी थी। इन सेनानियों ने अपने बुद्धिबल से आसपास की ब्रिटिश सत्ता के चिह्न मिटाकर संग्राम छेड़ रखा था। २६ मई को क्रांतिकारी शिवदान, रामनाथ तिवारी और चतुर्भुज वैश्य को कासगंज में पीपल और नीम के पेड़ पर लटकाकर संगीनों से मौत के घाट उतार दिया। इसके अलावा कादरगढ़, पटियाली, कालाजार और अन्य स्थानों पर क्रांति ने वीरों की जानें लीं। क्रांतिकारियाें ने तमाम ब्रिटिश फौजियों को भी मौत के घाट उतार दिया। कालाजार में तो नौ ब्रिटिश को मौत के घाट उतारा गया। अंग्रेजों के अत्याचार जैसे जैसे बढ़ते गए वैसे वैसे क्रांति तेज होती गई। गंगा नदी और काली नदी के घाटों पर क्रांतिकारियों ने कब्जा जमाया था। कासगंज में चतुर्भुज चौबे नाम के क्रांतिकारी के सर को अंग्रेजों ने काटकर पीपल के पेड़ पर लटका दिया था। १८५७ की क्रांति में अनेकों क्रांति के सपूतों ने जबरदस्त लोहा लिया और अपनी जान गवाईं, लेकिन क्रांति का ज्वर कभी ठंडा नहीं हुआ। अंग्रेज कलक्टरों को अपनी जान बचाने के लिए दूसरे क्षेत्रों में भागना पड़ा था। गंगाघाटों पर घुड़सवार ब्रिटिश फौजियों को भी मौत के घाट उतारा गया। सोरों के कादरवाड़ी इलाके में क्रांतिकारियों के दमन के लिए तोपों द्वारा कादरगढ़ के गढ़ को ध्वस्त किया गया। यहां क्रांतिकारी टोडर सिंह, हरिहर सिंह, जोधा सिंह, विजय सिंह ने जमकर मोर्चा लिया। पटियाली में भी अंग्रेज शासकों और क्रांतिकारियों के बीच खूनी संघर्ष हुआ। क्रांतिकारी दयाराम, बहादुरलाल, खान सहाय ने सरकारी अंग्रेजी खजाने को लूटा। यहां जबरदस्त जंग हुई।
बबलू और रामनाथ थे कांतिकारियों मैसेंजर
कासगंज।१८५७ की क्रांति में मई का महीना ऐसा था, जब इस क्षेत्र में क्रांतिकारियों ने अंगे्रेजों के छक्के छुड़वा दिए। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को ऐसे ही मात नहीं दे दी, बल्कि जन बल के साथ पूरी रणनीति को साथ लेकर आजादी की जंग लड़ी गई। आजादी की जंग लड़ने वाले इन लड़ाकों के नाम आज भी बड़े सम्मान के साथ लिए जाते हैं। ये दोनों नाम सोरों के बबलू और रामनाथ तिवारी के हैं। क्रांति के दौरान बबलू और रामनाथ ने क्रांतिकारियों के बीच नारद ऋषि की भूमिका निभाई। क्रांति केंद्रों से संपर्क करके क्रांतिकारियों के बीच समाचार पहुंचाने का काम इन दोनों ही लोगों के जिम्मे था। जिसे दोनों ही लोगों ने बखूबी निभाया। अत्यंत साहसी और बुद्धिमान माने जाने वाले इन दोनों ही क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के पहरे की परवाह किए बगैर क्रांति के संदेश को क्रांति केंद्रों और क्रांतिकारियों के बीच पहुंचाया। इन संदेशों को पहुंचाने के लिए रात रात भर पैदल चलकर यह अपने केंद्रों पर सूचनाएं देते थे। वहीं गोरों की रणनीति पर भी तीखी नजर बनाते थे। कासगंज, सोरों, गंजडुंडवारा, पटियाली और अन्य ग्रामीण इलाकों के तमाम क्रांति के पुरोधाओं के बीच दोनों ही लोगों को बहादुर माना जाता था। इनके बहादुरी के किस्से आज भी लोगों की जुबान पर हैं। आगरा और कानपुर के क्रांति केंद्रों तक संदेशों का आवागमन होता था। बाद में २६ मई को रामनाथ तिवारी को निर्ममता पूर्वक कासगंज में पेड़ पर लटकाकर मौत के घाट उतार दिया गया। रामनाथ तिवारी की कुर्बानी के बाद क्रांति की ज्वाला और तेज हो गई। बबलू अंग्रेजी फौज के हाथ नहीं लग सका। दोनों ही क्रांति के पुरोधा क्षेत्र के लोगों के बीच आज भी याद किए जाते हैं। |
Subscribe to:
Comments (Atom)