कासगंज।१८५७ की क्रांति में मई का महीना ऐसा था, जब इस क्षेत्र में क्रांतिकारियों ने अंगे्रेजों के छक्के छुड़वा दिए। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को ऐसे ही मात नहीं दे दी, बल्कि जन बल के साथ पूरी रणनीति को साथ लेकर आजादी की जंग लड़ी गई। आजादी की जंग लड़ने वाले इन लड़ाकों के नाम आज भी बड़े सम्मान के साथ लिए जाते हैं। ये दोनों नाम सोरों के बबलू और रामनाथ तिवारी के हैं। क्रांति के दौरान बबलू और रामनाथ ने क्रांतिकारियों के बीच नारद ऋषि की भूमिका निभाई। क्रांति केंद्रों से संपर्क करके क्रांतिकारियों के बीच समाचार पहुंचाने का काम इन दोनों ही लोगों के जिम्मे था। जिसे दोनों ही लोगों ने बखूबी निभाया। अत्यंत साहसी और बुद्धिमान माने जाने वाले इन दोनों ही क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के पहरे की परवाह किए बगैर क्रांति के संदेश को क्रांति केंद्रों और क्रांतिकारियों के बीच पहुंचाया। इन संदेशों को पहुंचाने के लिए रात रात भर पैदल चलकर यह अपने केंद्रों पर सूचनाएं देते थे। वहीं गोरों की रणनीति पर भी तीखी नजर बनाते थे। कासगंज, सोरों, गंजडुंडवारा, पटियाली और अन्य ग्रामीण इलाकों के तमाम क्रांति के पुरोधाओं के बीच दोनों ही लोगों को बहादुर माना जाता था। इनके बहादुरी के किस्से आज भी लोगों की जुबान पर हैं। आगरा और कानपुर के क्रांति केंद्रों तक संदेशों का आवागमन होता था। बाद में २६ मई को रामनाथ तिवारी को निर्ममता पूर्वक कासगंज में पेड़ पर लटकाकर मौत के घाट उतार दिया गया। रामनाथ तिवारी की कुर्बानी के बाद क्रांति की ज्वाला और तेज हो गई। बबलू अंग्रेजी फौज के हाथ नहीं लग सका। दोनों ही क्रांति के पुरोधा क्षेत्र के लोगों के बीच आज भी याद किए जाते हैं। |
Wednesday, August 18, 2010
बबलू और रामनाथ थे कांतिकारियों मैसेंजर
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