Saturday, December 31, 2011
Monday, December 5, 2011
Tuesday, September 13, 2011
भगवान वराह का सबसे प्रिय स्थान है सूकर क्षेत्र
कासगंज। सोरों जी पूर्वजों के मोक्ष का श्रेष्ठ धाम है। शूकर क्षेत्र का सोरों पृथ्वी का उद्धार करने वाले भगवान विष्णु के तृतीय अवतार भगवान श्री वराह की निर्वाण स्थली है। स्वयं भगवान वराह ने यहां के महात्म्य के बारे में कहा है कि हे दवि। हे पृथ्वी।। जो व्यक्ति मेरे परम मित्र सूकर क्षेत्र में जाते हैं, उनके पूर्ववर्ती 10 पूर्वज तथा 15 परवर्ती वंशजों की सद्गति सुनिश्चित हो जाती है। इसके अतिरिक्त तीर्थयात्रा करने वाले व्यक्ति को अगले सात जन्म तक उच्चकुल में जन्म लेता है।
सोरों जी के हर की पौड़ी में मनुष्य जितनी अस्थियां विसर्जित करते हैं, उतने सहस्त्र वर्ष पर्यंत उनके पूर्वज मेरे लोक में सुख भोगकर पृथ्वी पर राज करते हैं। वराह पुराण के मुताबिक यह पूर्वजों के मोक्ष का श्रेष्ठ धाम है। यहां किया गया श्राद्ध कर्म सीधे पितरों को प्राप्त होता है। यहां इस क्षेत्र में किया गया पिंडदान कर्म तर्पण और दान कर्म पितरों की संतुष्टि का साधन बनता है। यह पावन क्षेत्र है, यह उपवास करने, रात्रि जागरण करने और पितरों के श्राद्ध से यहां महापुण्य प्राप्त होता है।
डॉ. राधाकृष्ण दीक्षित का कहना है कि यह क्षेत्र पृथ्वी का आदि क्षेत्र है। यह वराह गंगा, वृहद गंगा और भागीरथ गंगा के पवित्र अंचल में स्थित है। इस तीर्थस्थल को देखने, यहां की रज को स्पर्श करने और दान आदि से पितर ही नहीं, व्यक्ति स्वयं भी मोक्ष का अधिकारी हो जाता है। भगवान वराह का यह अति प्रिय क्षेत्र है। इसी के चलते यहां उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। श्राद्ध कर्म के लिए शूकर क्षेत्र सर्वोत्तम है। यहां मृतक परिजनों की अस्थियों का विसर्जन वर्षों से किया जाता है।
सोरों जी के हर की पौड़ी में मनुष्य जितनी अस्थियां विसर्जित करते हैं, उतने सहस्त्र वर्ष पर्यंत उनके पूर्वज मेरे लोक में सुख भोगकर पृथ्वी पर राज करते हैं। वराह पुराण के मुताबिक यह पूर्वजों के मोक्ष का श्रेष्ठ धाम है। यहां किया गया श्राद्ध कर्म सीधे पितरों को प्राप्त होता है। यहां इस क्षेत्र में किया गया पिंडदान कर्म तर्पण और दान कर्म पितरों की संतुष्टि का साधन बनता है। यह पावन क्षेत्र है, यह उपवास करने, रात्रि जागरण करने और पितरों के श्राद्ध से यहां महापुण्य प्राप्त होता है।
डॉ. राधाकृष्ण दीक्षित का कहना है कि यह क्षेत्र पृथ्वी का आदि क्षेत्र है। यह वराह गंगा, वृहद गंगा और भागीरथ गंगा के पवित्र अंचल में स्थित है। इस तीर्थस्थल को देखने, यहां की रज को स्पर्श करने और दान आदि से पितर ही नहीं, व्यक्ति स्वयं भी मोक्ष का अधिकारी हो जाता है। भगवान वराह का यह अति प्रिय क्षेत्र है। इसी के चलते यहां उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। श्राद्ध कर्म के लिए शूकर क्षेत्र सर्वोत्तम है। यहां मृतक परिजनों की अस्थियों का विसर्जन वर्षों से किया जाता है।
Monday, September 12, 2011
Monday, August 29, 2011
Sunday, August 28, 2011
जन गण मन की कहानी ...............................
सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये।
इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा।उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए। रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता"।
इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था।इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है "भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। "जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया। जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये।
रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था।उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया। क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।
रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया। सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे।
रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) । इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत 'जन गण मन' अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे।
7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये।1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया। कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और एक गरम दल।गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी। वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे। उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना। हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे।
वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी। नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत "जन गण मन" गाया करते थे और गरम दल वाले "वन्दे मातरम"।नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया। जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली। संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई।बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा"। लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए।नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है। उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था।
बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम। बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है।
तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का। अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है ?इतने लम्बे पत्र को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद्। और अच्छा लगा हो तो इसे फॉरवर्ड कीजिये, आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस भाषा में अनुवादित कीजिये अंग्रेजी छोड़ कर
जय हिंद |
इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा।उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए। रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता"।
इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था।इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है "भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। "जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया। जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये।
रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था।उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया। क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।
रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया। सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे।
रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) । इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत 'जन गण मन' अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे।
7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये।1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया। कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और एक गरम दल।गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी। वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे। उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना। हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे।
वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी। नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत "जन गण मन" गाया करते थे और गरम दल वाले "वन्दे मातरम"।नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया। जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली। संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई।बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा"। लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए।नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है। उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था।
बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम। बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है।
तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का। अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है ?इतने लम्बे पत्र को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद्। और अच्छा लगा हो तो इसे फॉरवर्ड कीजिये, आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस भाषा में अनुवादित कीजिये अंग्रेजी छोड़ कर
जय हिंद |
Saturday, August 27, 2011
Monday, July 11, 2011
Friday, July 8, 2011
भीषण भिड़ंत के बाद लहराती रहीं बोगियां
अड़ूपुरा (कांशीरामनगर)। रेल हादसे के प्रत्यक्ष गवाह छपरा के यात्री थे। खूनी मंजर देख उनमें इस कदर खौफ व्याप्त था कि हर कोई ईश्वर का शुक्रिया अदा कर रहा था। रात के सन्नाटे में ट्रेन की भीषण भिड़ंत की आवाज सुनकर लोग जग गए। उनका कहना था कि ट्रेन की बोगियां करीब आधा किमी से अधिक दूर तक लहराती रही थीं। जब गाड़ी रुकी तब उनकी जान में जान आई।
दुर्घटना में हैरतअंगेज बात तो यह थी कि जब ट्रेन चालक ने इमरजेंसी ब्रेक लिए तो पॉवर ब्रेक का पाइप जोड़ों से टूट गया। ऐसे में क्षतिग्रस्त बस का गार्डर इंजन के पहिए में फंस गया, जिसके सहारे धीरे-धीरे ट्रेन रुक गई। इंजन की पीछे की बोगी संख्या 90785 में यात्रा कर रहे यात्री इरशाद खान ने बताया कि जिस समय दुर्घटना घटी, वह पानी पीने के लिए उठा था कि भीषण आवाज हुई और गाड़ी लहराने लगी। धुएं का गुबार उठा। उन्हें लगा कि अब जान नहीं बचेगी। वहीं ट्रेन में मथुरा से सवार हुए सुभाष और अरविंद ने बताया कि वह दोनों लोग आपस में बात कर रहे थे कि उसी दौरान हादसा हुआ। यात्री वसीम अहमद ने बताया कि बस दुर्घटना के बाद बस के गार्डर और बस का मलबा इंजन के पहियों में फंस गया जो घिसटता हुआ इंजन के साथ आगे बढ़ रहा था। बे्रक पाइप के टूट जाने पर गार्डर की वजह से ट्रेन आगे जाकर रुक पाई। यह सब भगवान का शुक्र था, अन्यथा ट्रेन भी पलट सकती थी।
kasganj kanshiramnagar train accident on 7july 2011
असुरक्षित है कासगंज-कानपुर रेलमार्ग
कासगंज। मथुरा-कानपुर रेल मार्ग असुरक्षित है। मानव रहित क्रासिंग पर लगातार हादसे हो रहे हैं। इसके बावजूद रेल प्रशासन की नींद नहीं टूट रही है। हादसों को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।
मथुरा-कानपुर रेल मार्ग पर यह पहला हादसा नहीं है। मथुरा-कानपुर रेल मार्ग के आमान परिवर्तन के बाद यहां गाड़ियों की संख्या काफी बढ़ी हैं। इसमें मालगाड़ियों का आवागमन इस मार्ग से होता है। कुल ५६ अनमैंड रेलवे क्रॉसिंग हैं, जिनमें से १६ मैंड रेलवे क्रॉसिंग ही हैं। इसके अलावा मथुरा की ओर भी विभिन्न इलाकों में कई अनमैंड रेलवे क्रॉसिंग पर हादसे हुए हैं। सबसे बड़ा हादसा कासगंज-सहावर मार्ग पर चांडी रेलवे क्रॉसिंग पर हुआ था। जहां दबंगई के बल पर रेल फाटक खुलवाकर बस निकालने की कोशिश में बस-ट्रेन की भिड़ंत हुई थी और ४८ मौत हुई थी। यह हादसा जिले का अब तक का सबसे बड़ा रेल हादसा है।
अनमैंड क्रॉसिंग पर अब तक हुए हादसे
- चांडी रेलवे क्रॉसिंग पर हादसे में ४८ की मौत
- दिहारी मेहारी रेलवे क्रॉसिंग के हादसे में नौ मरे
- कासगंज और सहावर के बीच हादसे में दो मरे
- कासगंज-बरेली टै्रक पर ट्रेन-जुगाड़ की भिड़ंत, दो मरे
- कासगंज-सहावर के बीच ट्रेन की टक्कर से ट्रैक्टर कटा
- कासगंज-फर्रुखाबाद एक्सप्रेस बस से टकराई, बाल-बाल बचे
रेलवे के संरक्षा आयुक्त ने किया घटनास्थल का दौरा
कासगंज। अड़ूपुरा रेलवे क्रॉसिंग पर हुई रेल दुर्घटना की जांच रेलवे के संरक्षा आयुक्त नगर विमानन मंत्रालय के प्रभात कुमार वाजपेयी ने शुरू कर दी है। संरक्षा आयुक्त ने दुर्घटनास्थल का दौरा कर हालातों का जायजा लिया। वहीं दुर्घटना के संबंध में एटा चिकित्सालय पहुंचकर घायलों से बातचीत की। शनिवार को भी संरक्षा आयुक्त जांच करेंगे।
रेल दुर्घटना की जांच के निर्देश रेल मंत्रालय के द्वारा दुर्घटना के बाद से ही जारी कर दिए गए थे और इसका जिम्मा श्री वाजपेयी को सौंपा गया है। दुर्घटना के बाद शाम को ही श्री वाजपेयी ने घटनास्थल का दौरा कर लिया था। कासगंज के रेलवे अधिकारी विश्रामालय में जांच कार्य में लगे कर्मियों का शिविर शुक्रवार को शुरू हो गया जहां जांच कार्य की प्रक्रिया शुरू की गई। जांच के लिए श्री वाजपेयी ने एटा पहुंचकर घायलों से बातचीत कर बयान दर्ज कराए। रेल संचालन से जुड़े अधिकारी व कर्मियों के बयान भी जांच टीम के द्वारा दर्ज किए गए। इसके अलावा ट्रेन के चालक व गार्ड के बयान भी लिए गए। जांच का काम आज शनिवार को भी जारी रहेगा। इस दुर्घटना को लेकर जांच पड़ताल के परिणाम से यह भी स्पष्ट होगा कि यह दुर्घटना महज लापरवाही के चलते हुई है या फिर किसी तरह की रंज इसके पीछे है। इज्जतनगर रेल मंडल के पीआरओ राजेन्द्र सिंह ने बताया कि जांच प्रक्रिया आज शनिवार को और चलेगी और घटना के संबंध में अपने बयान दर्ज करा सकते हैं। इसके अलावा रेल संरक्षा पूर्वोत्तर परिमंडल हजरतगंज लखनऊ को घटना के संबंध में लिखकर दिया जा सकता है।
बस का चालक सोया था छत पर
कासगंज। कहते हैं कि मौत किसी न किसी बहाने से और किसी न किसी को बहाना बनाकर अपनी ओर खींच ही लाती है। ऐसा ही परिणाम बारातियों की बस का रहा। न बस का मुख्य चालक रात में वापस जाने को तैयार था और न ही वधू पक्ष के लोग, लेकिन बारातियों की मौत उन्हें खींच रही थी जो जाने की जिद पर अड़े थे।
बारातियों की बस को चला रहा सह चालक और परिचालक मुन्ना ठाकुर बस के बंद होते ही बस को स्टार्ट करने के प्रयास में जुटा। जब बस स्टार्ट नहीं हुई तो उसने बारातियों से बस में धक्का लगाने को भी कहा। लेकिन कोई भी राजी नहीं हुआ। यहां तक कि उल्टे मुन्ना से बारातियों ने गाली गलौज कर दी। इसी जद्दोजहद में छपरा एक्सप्रेस आ गई और बड़ी दुर्घटना घट गई। वीभत्स दुर्घटना के बाद ऐसे तमाम चर्चाएं उबर कर सामने आईं। वहीं पटियाली पुलिस ने रेलवे द्वारा दुर्घटना की प्राथमिकी दर्ज करा देने के बाद जांच पड़ताल शुरू की है। बस का मुख्य चालक पेशकार पुत्र रामसिंह गांव बिलारपुर थाना अलीगंज था जो बारातियों से झगड़े के बाद बस की छत पर जाकर सो गया था। जिस समय दुर्घटना घटी वह बस की छत पर सो रहा था और टक्कर में दूर छिटककर गिरा और घायल हो गया। पुलिस जांच पड़ताल में ड्राइवर के नाम की शिनाख्त हुई है, लेकिन अभी ड्राइवर पुलिस को नहीं मिला है। पटियाली पुलिस के पुलिस क्षेत्राधिकारी पंकज पांडे ने बताया कि पुलिस की जांच पड़ताल चल रही है।
टे्रन के इंजन पर लटके थे कई शव
अड़ूपुरा (कांशीरामनगर)। हर तरफ चीत्कार, लोगों की भारी भरकम भीड़, महिलाओं की चीखपुकार, रेल इंजन पर लटके लोगों के शव। यह वीभत्स नजारा ट्रेन एक्सीडेंट की हकीकत बयां कर रहा था। रेल इंजन के आगे बस के परखच्चे देख लोग बुरी तरह दहल गए। जिस किसी ने भी मथुरा-कानपुर रेलमार्ग पर पटियाली क्षेत्र के अड़ूपुरा क्रासिंग पर यह ट्रेन हादसा देखा उसकी रूह कांप गई।
अड़ूपुर के मानव रहित रेलवे क्रॉसिंग पर रात्रि करीब दो बजे खड़ी बस को तेज गति से जा रही छपरा सुपरफास्ट एक्सप्रेस ने भीषण टक्कर मारी तो बस के परखच्चे उड़ गए। कुछ ही पलों में बस में मौजूद सवारियों के शव नजर आ रहे थे। जो जहां था वहां से हिल भी न सका। बस के आगे बैठे लोगों के शव ट्रेन के इंजन में जाकर बुरी तरह फंस गए। कुछ शव इतने वीभत्स रुप में थे कि केवल मांस के लोथड़े ही नजर आ रहे थे। प्रशासनिक अधिकारियों की तत्परता और रेलवे की रिलीफ ट्रेन पहुंचने के बाद अंधेरे में एकसाथ कई टार्चाें की रोशनी में शवों को झाड़ियों, गड्ढों से तलाशा गया। सुबह करीब साढ़े चार बजे अंधेरे को चीरकर सूरज की लालिमा का असर दिखाई दिया तो जहां-तहां पड़े लोगों के शव दिखाई दिए। जिलाधिकारी सेल्वा कुमारी जे, पुलिस अधीक्षक रतन कुमार श्रीवास्तव करीब साढ़े तीन बजे ही घटनास्थल पर पहुंच गए थे। उन्हाेंने राहत कार्य तेजी से शुरू करवाया। इससे पूर्व एएसपी दद्दनपाल, सीओ पंकज पांडे, पटियाली के इंस्पेक्टर घायलों को चिकित्सालय भेज चुके थे। पुलिस ने शवों को तलाश पोस्टमार्टम के लिए एटा भेजा। कुल 33 शव घटनास्थल पर मिले। जबकि अन्य घायलों ने चिकित्सालय में उपचार के दौरान दम तोड़ दिया। घटनास्थल का मंजर हादसे की वीभत्सता की गवाही दे रहे थे। कहीं बस के परखच्चे बिखरे पड़े थे कहीं बारातियों का सामान पड़ा था।
‘कितना बदल गया इंसान...’
अड़ूपुरा (कांशीरामनगर)। ‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान...’। इस गीत के बोल मौजूदा परिवेश में सटीक बैठते हैं। मथुरा-कानपुर रेलमार्ग के अड़ूपुर क्रॉसिंग पर हुए रेल हादसे में ३८ जानें चली गईं, ३२ घायल हो गए। इतनी बड़ी दुर्घटना होने के बाद लोगों के हाथ मदद के लिए नहीं उठे, बल्कि मृतकों की जेबों को साफ किया गया।
अड़ूपुर का मंजर इतना वीभत्स था कि देखने वालों के रोंगटे खड़े हो गए लेकिन यहां लोग मृतकों और घायलों की मदद के बजाए बचते रहे। पुलिस और रेलकर्मी शवों की खोजबीज में जुटे थे। उस दौरान जब पुलिस लोगों से सहयोग की बात करते तो हर कोई किनारा कर लेता। ऐसी स्थिति को देख मानवता शर्मसार हो रही थी। सिर्फ वही लोग मदद को आगे आ रहे थे जिनके रिश्तेदार, परिचित हादसे का शिकार हुए। एसपी रतन कुमार श्रीवास्तव, एएसपी पंकज पांडे ने खुद मृतकों को उठाने की पहल की तब कहीं जाकर लोग आगे बढ़े और शवों को उठाकर पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने में मदद की। वहीं इस हादसे में ज्यादातर मृत लोगों के मोबाइल गायब थे। उनकी जेबें भी साफ थीं। कुछ घायल लोगों ने बताया कि जब तक पुलिस और अन्य राहत टीम पहुंचती। कुछ लोगों ने मृतकों, घायलों की जेब से नकदी, सामान तथा मोबाइल उड़ा लिए। सवाल है कि आखिर क्या हो गया इंसानी रिश्तों को? हालात इंसानी मूल्यों में गिरावट की गवाही दे रहे थे और इस सच पर सोचने को मजबूर कर रहे थे कि आदमी का मूल्य उसकी सांसों तक टिकी है। सांस थमते ही आदमी ही आदमी से कतराता क्यों है।
रंज या लापरवाही, जांच में खुलेंगी परत
अड़ूपुरा (कांशीरामनगर)। भीषण ट्रेन हादसे के दौरान लापरवाही किसकी थी इसकी परत जांच के बाद ही सामने आएगी। ट्रेन हादसे की जांच नगर विमानन मंत्रालय के अधिकारी और पूर्वोत्तर परिमंडल के रेल संरक्षा आयुक्त प्रभात वाजपेयी को सौंपी गई है।
जांच का यह कार्य शुक्रवार (आज) और शनिवार तक चलेगा। श्री वाजपेयी रेलवे के विश्रामालय गृह पर सुबह १०.३० बजे जांच शुरू करेंगे। यह दुर्घटना बस चालक-परिचालक और बारातियों के बीच मारपीट को लेकर हुई रंज के चलते हुई या फिर लापरवाही दुर्घटना का कारण बनी, इसकी परतें भी जांच में ही खुलेंगी। दुर्घटना स्थल पर घायलों ने रेलवे और पुलिस प्रशासन के अधिकारियों को बताया कि बारात से लौट रहे बाराती रात में ही ड्राइवर से बस ले चलने की कह रहे थे। बस चालक ने बस को सुबह ले जाने को कहा। इस पर बारातियों और चालक के बीच मारपीट भी हुई। बारातियों ने परिचालक से भी मारपीट की। इसके बाद चालक-परिचालक बस को ले जाने पर तैयार हो गए। बाद में रेल क्रॉसिंग पर बस बंद हुई और हादसा हो गया। प्रशासन का मानना है कि जिस व्यक्ति की अभी तक शिनाख्त नहीं हुई है, वही बस परिचालक है। उसकी जेब से डीजल की पर्ची बरामद हुई है। फिलहाल जांच के बाद ही हकीकत का पता चलेगा।
इंजन से काट कर निकाल गए गाटर
कासगंज। रेल हादसे में बस के गाटर, रेल के इंजन के पहियों में बुरी तरह फंस गए। रेल कर्मियों ने गाटरों को निकालने का काफी प्रयास किया। जब सफल नहीं हुए तो बैल्डिंग से काटकर निकाला।
अज्ञात बस चालक के विरुद्ध मुकदमा
कासगंज। अड़ुपुर हादसे में रेलवे विभाग ने पटियाली कोतवाली में अज्ञात बस चालक के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराई है। रेलवे के संरक्षा आयुक्त रेल पथ एनएल मीणा ने कोतवाली में तहरीर दी। चालक पर बस को रेल पथ पर खड़ा करने का आरोप लगाया है। तहरीर के आधार पर पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर ली है। इसकी जांच पटियाली पुलिस करेगी।
अड़ूपुरा (कांशीरामनगर)। भीषण ट्रेन हादसे के दौरान लापरवाही किसकी थी इसकी परत जांच के बाद ही सामने आएगी। ट्रेन हादसे की जांच नगर विमानन मंत्रालय के अधिकारी और पूर्वोत्तर परिमंडल के रेल संरक्षा आयुक्त प्रभात वाजपेयी को सौंपी गई है।
जांच का यह कार्य शुक्रवार (आज) और शनिवार तक चलेगा। श्री वाजपेयी रेलवे के विश्रामालय गृह पर सुबह १०.३० बजे जांच शुरू करेंगे। यह दुर्घटना बस चालक-परिचालक और बारातियों के बीच मारपीट को लेकर हुई रंज के चलते हुई या फिर लापरवाही दुर्घटना का कारण बनी, इसकी परतें भी जांच में ही खुलेंगी। दुर्घटना स्थल पर घायलों ने रेलवे और पुलिस प्रशासन के अधिकारियों को बताया कि बारात से लौट रहे बाराती रात में ही ड्राइवर से बस ले चलने की कह रहे थे। बस चालक ने बस को सुबह ले जाने को कहा। इस पर बारातियों और चालक के बीच मारपीट भी हुई। बारातियों ने परिचालक से भी मारपीट की। इसके बाद चालक-परिचालक बस को ले जाने पर तैयार हो गए। बाद में रेल क्रॉसिंग पर बस बंद हुई और हादसा हो गया। प्रशासन का मानना है कि जिस व्यक्ति की अभी तक शिनाख्त नहीं हुई है, वही बस परिचालक है। उसकी जेब से डीजल की पर्ची बरामद हुई है। फिलहाल जांच के बाद ही हकीकत का पता चलेगा।
इंजन से काट कर निकाल गए गाटर
कासगंज। रेल हादसे में बस के गाटर, रेल के इंजन के पहियों में बुरी तरह फंस गए। रेल कर्मियों ने गाटरों को निकालने का काफी प्रयास किया। जब सफल नहीं हुए तो बैल्डिंग से काटकर निकाला।
अज्ञात बस चालक के विरुद्ध मुकदमा
कासगंज। अड़ुपुर हादसे में रेलवे विभाग ने पटियाली कोतवाली में अज्ञात बस चालक के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराई है। रेलवे के संरक्षा आयुक्त रेल पथ एनएल मीणा ने कोतवाली में तहरीर दी। चालक पर बस को रेल पथ पर खड़ा करने का आरोप लगाया है। तहरीर के आधार पर पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर ली है। इसकी जांच पटियाली पुलिस करेगी।
Thursday, July 7, 2011
हादसे की जानकारी पर दौड़े परिजन
कासगंज। अड़ुपुरा में बांके लाल के यहां बेटी सुधा की बारात प्रदीप पुत्र भगवान सिंह की यादव गढ़ी खगारपुर मिरहची एटा से आई थी। खुशियों का माहौल था। भोजन करने के बाद अधिकांश बाराती रात में ही बस से घर जा रहे थे। जैसे ही रेल हादसे की जानकारी परिजनों को मिली, लोग स्तब्ध रह गए। वैवाहिक कार्यक्रमों की रस्मों को छोड़कर लोग घटना स्थल की ओर दौड़ पड़े। वैवाहिक पंडाल में सन्नाटा पसर गया।
पालिकाध्यक्ष ने दी श्रद्धांजलि
कासगंज। पालिकाध्यक्ष राजेंद्र बौहरे रेल हादसे के बाद अड़ुपुर पहुंचे। उन्होंने शोक सभा कर मृतकों को श्रद्धांजलि दी। शोक सभा में बड़ी संख्या में पालिका कर्मी भी शामिल हुए।
बरेली फास्ट पैसेंजर-रुहेलखंड से टकराने से बची
कासगंज। बड़े ट्रेन हादसों के बावजूद रेल प्रशासन की लापरवाही थमने का नाम नहीं ले रही है। कासगंज में रविवार रात्रि कासगंज से बरेली जाने वाली फास्ट पैसेंजर दुर्घटनाग्रस्त होने से बाल-बाल बच गई। ड्राइवर की सतर्कता से हादसा टल गया। वरना यह ट्रेन स्टेशन पर खड़ी रुहेलखंड एक्सप्रेस से जा भिड़ती। हादसे का कारण सीजर का ऑन न हो पाना बताया जा रहा है। अभी तक रेल प्रशासन इस मामले में स्थिति स्पष्ट नहीं कर पाया है।
उल्लेखनीय है कि कासगंज प्लेटफार्म से रात्रि करीब सवा नौ बजे बरेली जाने के लिए फास्ट पैसेंजर रवाना हुई। ट्रेन बरेली के चालक रमेश चंद्र लेकर जा रहे थे। प्लेटफार्म से ट्रेन बरेली की ओर रवाना हुई। प्लेटफार्म से निकलने के बाद ट्रेन बरेली के रूट पर कैंची ऑन होने के बाद आगे बढ़ती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ट्रेन सीधे दो नंबर प्लेटफार्म पर खड़ी रुहेलखंड एक्सप्रेस की ओर बढ़ती जा रही थी। ट्रेन चालक रमेश चंद्र की नजर पड़ी और उन्होंने तत्काल ही इमरजेंसी ब्रेक लगा कर गाड़ी को रोका। गनीमत थी कि गाड़ी की गति काफी कम थी। ट्रेन चालक ने इस मामले की जानकारी तत्काल स्टेशन अधीक्षक को दी। ट्रेन वापस करके सीजर ऑन किया गया। ट्रेन को बरेली के लिए रवाना किया गया। इसको लेकर कासगंज का रेल प्रशासन पूरी तरह से हक्का-बक्का रह गया। उन्हें इस लापरवाही का जवाब भी नहीं सूझ रहा था। कासगंज के स्टेशन अधीक्षक देशराज सिंह ने बताया कि सीजर लाइट डिम होने के कारण चालक की नजर इस पर नहीं पड़ सकी, जिसके चलते ट्रेन रुहेलखंड के ट्रैक पर चली गई। उन्होंने कहा कि मामले की जांच की जा रही है।
Tuesday, June 7, 2011
अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं ।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ: ॥
— शुक्राचार्य
कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं ।
---------------
कोऽतिभारः समर्थानामं , किं दूरं व्यवसायिनाम् ।
को विदेशः सविद्यानां , कः परः प्रियवादिनाम् ॥
— पंचतंत्र
जो समर्थ हैं उनके लिये अति भार क्या है ? व्यवस्सयियों के लिये दूर क्या है?
विद्वानों के लिये विदेश क्या है? प्रिय बोलने वालों के लिये कौन पराया है ?
अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ: ॥
— शुक्राचार्य
कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं ।
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कोऽतिभारः समर्थानामं , किं दूरं व्यवसायिनाम् ।
को विदेशः सविद्यानां , कः परः प्रियवादिनाम् ॥
— पंचतंत्र
जो समर्थ हैं उनके लिये अति भार क्या है ? व्यवस्सयियों के लिये दूर क्या है?
विद्वानों के लिये विदेश क्या है? प्रिय बोलने वालों के लिये कौन पराया है ?
Tuesday, May 24, 2011
Monday, May 2, 2011
Tuesday, April 12, 2011
Thursday, April 7, 2011
१४३८१५६ आबादी वाला जनपद है कांशीरामनगर
भारत की जनगणना २०११ के अंतर्गत कांशीरामनगर जनपद की जनगणना का आंकड़ा सामने आ गया है। इसके मुताबिक कांशीरामनगर की जनसंख्या १४३८१५६ है। जनगणना-२००१ के मुकाबले दस वर्षो में १७.०५ फीसदी की दर से जनसंख्या वृद्धि दर्ज हुई है। मौजूदा प्रति व्यक्ति घनत्व की स्थिति ७३६ स्क्वायर मीटर की है।
वर्ष २००१ की जनगणना के समय कांशीरामनगर का हिस्सा एटा में शामिल था, इसलिए कोई स्पष्ट आंकड़ा तो नहीं, लेकिन तहसीलवार आंकड़ों के मुताबिक जनगणना २००१ में जनसंख्या ११,८६४७९ रही। वर्ष २०११ की कुल जनगणना में ७,६५५२९ पुरुष हैं, जबकि महिलाओं की संख्या ६,७२६२७ है। जीरो से छह वर्ष तक के बच्चों की संख्या २,४४८५२ है। इसमें १,२९६९० बालक और १,१५१५९ बालिकाएं हैं। बालिकाओं की जन्म दर बालकों के मुकाबले कम है। महिला और पुरुषों के बीच लिंगानुपात दर ८७९ की है। जीरो से छह वर्ष के बच्चों के बीच लिंगानुपात की दर ८८८ है। साक्षरता की दर में वृद्धि दर्ज की गई है। कुल आबादी में ६२.३० फीसदी लोग साक्षर हैं। इनकी आबादी का आंकड़ा ७४३४७९ है। साक्षरता प्रतिशत में पुरुष काफी आगे हैं। पुरुषों की साक्षरता दर ७२.९१ है। जबकि महिलाओं की साक्षरता दर ५०.२० है। कुल साक्षर पुरुष ४६३६१३ हैं, जबकि साक्षर महिलाएं २७९८६२ हैं। इसके अलावा अन्य जनसंख्या में ५२ लोग हैं। जनसंख्या के बालक वर्ग में केवल एक शिशु है।
वर्ष २००१ की जनगणना के समय कांशीरामनगर का हिस्सा एटा में शामिल था, इसलिए कोई स्पष्ट आंकड़ा तो नहीं, लेकिन तहसीलवार आंकड़ों के मुताबिक जनगणना २००१ में जनसंख्या ११,८६४७९ रही। वर्ष २०११ की कुल जनगणना में ७,६५५२९ पुरुष हैं, जबकि महिलाओं की संख्या ६,७२६२७ है। जीरो से छह वर्ष तक के बच्चों की संख्या २,४४८५२ है। इसमें १,२९६९० बालक और १,१५१५९ बालिकाएं हैं। बालिकाओं की जन्म दर बालकों के मुकाबले कम है। महिला और पुरुषों के बीच लिंगानुपात दर ८७९ की है। जीरो से छह वर्ष के बच्चों के बीच लिंगानुपात की दर ८८८ है। साक्षरता की दर में वृद्धि दर्ज की गई है। कुल आबादी में ६२.३० फीसदी लोग साक्षर हैं। इनकी आबादी का आंकड़ा ७४३४७९ है। साक्षरता प्रतिशत में पुरुष काफी आगे हैं। पुरुषों की साक्षरता दर ७२.९१ है। जबकि महिलाओं की साक्षरता दर ५०.२० है। कुल साक्षर पुरुष ४६३६१३ हैं, जबकि साक्षर महिलाएं २७९८६२ हैं। इसके अलावा अन्य जनसंख्या में ५२ लोग हैं। जनसंख्या के बालक वर्ग में केवल एक शिशु है।
Tuesday, April 5, 2011
न्यूक्लियर खतरे मुहाने पर काशीरामनगर भी
- नरौरा न्यूक्लियर प्लांट से नजदी· है सीमा
- गंगा के माध्यम से पैदा हो सकते हैं न्यूक्लियर रेडीएशन के हालात
- भूकम्प को लेकर संवेदनशील इलाके में शामिल है नरौरा प्लांट
- जनपद में लोगों को नहीं है हालातों की जानकारी
- प्रशासन के द्वारा भी जागरुता नहीं
- परमाणु व प्राकृतिक आपदा प्रबंधन के इंतजाम जरुरी
काशीरामनगर जनपद प्राकृतिक आपदाओं वाला क्षेत्र काफी पहले से ही रहा है। जनपद का ५१ कीलोमीटर लम्बा भूभाग गंगा के मुहाने से जुड़ा है। नरौरा गंगा बांध से यहां केवल गंगा का ही संपर्क नहीं बल्कि यहां से निकाली गई नहर भी जनपद की सीमाओं से होकर गुजरती है। वर्षों से बाढ़ की आपदा झेल रहे इस इलाके में बाढ़ आपदा से निपटने के इंतजाम आज तक नहीं हो सके हैं। अब जबकी परमाणु खतरा भी महसूस किया जा रहा है और जनपद इस खतरे के मुहाने पर है, जानकार लोग इस खतरे से निपटने के लिए यहां के लोगों को प्रशिक्षित करने की बात भी करते हैं और परमाणु आपदा से निपटने के लिए इंतजाम की जरुरत महसूस करते हैं।
नरौरा परमाणु केंद्र कोई नया नहीं, भारत सरकार के द्वारा तमाम सुरक्षा प्रबंधों के बाद इस संयंत्र की स्थापना की गई है। भूकंपरोधी व अन्य तरह की सुरक्षा के उपाय यहां किये गए हैं। लेकिन अभी किसी बड़े भकंप की स्थिति का यहां सामना नहीं हो सका है, केवल उत्तरकाशी का भूकंप ही एक बड़े भूकंप के रुप में पिछले समय में निकला था। भूकंप के लगातार झटके आने के बाद और जापान में सुनामी और भूकंप के झटको की स्थिति को देखते हुए भारतीय भूगर्भ वैज्ञानिक भी चिंतित हुए हैं। उन्होने भूकंप के लिए जोन-४ को संवेदनशील माना है और इस जोन में नरौरा परमाणु संयंत्र भी आता है। जानकारों की बात पर भरोसा करैं तो इस इलाके में भूकंप की स्थिति भी गंगा के जल को रेडिएशन से प्रदूषित कर सकती है। क्योकि यहां भूगर्भ जलस्तर भी चार से पांच मीटर पर ही है। भूकंप का कोई झटका यहां के भूमिगत जल को रेडियोएक्टिव कर सकता है। क्योंकि यहाँ की मिट्टी बलुई और रेतीली है। पथरीली चट्टानें यहां नहीं हैं।
यदि भविष्य में कोई प्राकृतिक आपदा आती है तो उसके दुष्परिणामों से इंकार नहीं किया जा सकता। क्योकि सबसे अहम बात यह है की काशीरामनगर में सामान्य प्राकृतिक आपदाओं के प्रबंधन के इंतजाम नहीं हैं। ऐसे में परमाणु खतरे से निपट पाने की बात बेगानी है। क्षेत्र के लोग परमाणु संयंत्र के खतरे से ही आगाह नहीं हैं तो उनसे बचाव रखने की क्या उम्मीद की जा सकती है। जनपद में लोगों को बचाव के उपाय और खतरों से आगाह करना जरुरी है। यदि इस दिशा में समय रहते काम नहीं किया गया तो विकराल स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता शिवमंगल सिंह ने बताया की कोई रेडिएशन होने की स्थिति में गंगा के पानी में निश्चित रेडिएशन होगा। इस संबंध में उपाय करना भी अत्यंत आवश्यक है।
- अजय झंवर।
Friday, January 28, 2011
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